उस शाम मैं जब विश्वविद्यालय से घर पहुंची तो बच्चे कुछ रहस्य छुपाये हुए से लगे, कहने लगे कि एक चीज़ दिखानी है। डरते -डरते उन्होंने मुझे वह चीज दिखाई ......क्या चीज थी वह चीज़! 

हमारे मिट्ठू के पिंजरे में बंद एक चिड़िया। मिट्ठू तो कब का आज़ाद हो चुका था, और किसी पंछी का पिंजरे में कैद होना मुझे अच्छा नहीं लगा, सो बच्चों को जिसका डर था वही हुआ बहुत डांट पड़ी । तीन घंटे से बंद पंछी को आँगन में लाया गया और जैसे ही उसे खोला गया, वह चीं- चीं करता आँगन की नीची दीवार पर बैठ गया ............ आश्चर्य !! उसकी आवाज सुनते ही पल भर में आस-पास के पेड़ों पर छिपे उसके भाई-बन्धु आ गए और उसे अपने साथ ले गए, क्या विश्वास किया जा सकता है कि वे तीन घंटे से उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे !

हम मनुष्य तो विश्वास नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा निस्पृह स्नेह, लगाव व भाईचारा हम मनुष्यों में परस्पर कहाँ देखने को मिलता है।

-चंदा आर्य